ना जाने क्यूँ ...... मन में एक तरंग उठी और सोचा की मैं भी एक ब्लॉग लिख ही दूँ । जब लिखने की बारी आयी तो हाथ पैर में वही संवेदनाएँ होने लगी जो उस समय होती थी जब क्लास रूम में परीक्षा के दौरान होती थी । उस समय भी मन में भगवान को याद करता था और आज भी ब्लॉग लिखते समय भगवान को याद किया जब कोई डोमेन नहीं मिला तो लिखा मेरे भगवान और वो मिल भी गया । हालांकि लिखने का शोंक नहीं है लेकिन मन की कुछ भावनाएँ हैं जो बिना लिखे कही भी नहीं जा सकती ।
बचपन से ही एक ऐसे परिवार में पला जहां माहौल धार्मिक था क्ट्टर धार्मिक तो नहीं लेकिन उस अदृश्य शक्ति जिसे हम भगवान कहते हैं उससे डरने वाला परिवार । डर अब ये भगवान का डर है या कुछ और सब कुछ उलझा हुआ कभी पाप पुण्य में कभी समाज का डर कभी लोगो के कहने का डर । इसी डर में जीते जीते आज कुछ 30 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन डर अभी भी ज्यों का त्यों समाज का रिशतेदारों का और तो और जो मेरे साथ जुड़े लोग हैं उनसे भी डर । कभी कभी मन में आता है की सब छोड़ के कहीं दूर निकल जाऊ जहां " न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन " न समाज का डर हो न परिवार का , न पाप ना पुण्य । और ये विचार बस सोचने तक ही सीमित हैं क्यूंकी करने की हिम्मत तो वैसे ही खतम हो चुकी है । परिवार का मोह परिवार की जिम्मेवारियों में कुछ ऐसा भँवर बन गया है जिसमे से शायद इस जनम मे निकालना तो न ही हो पाये।
क्या मेरे जैसे और भी लोग हैं बस यही जानने के लिए ये लिख रहा हूँ की शायद कोई मेरे जैसा सोचने वाला भी इस दुनिया में है या सिर्फ एक मुझी को ही ये अजीबोगरीब सा स्वभाव दिया गया है।
क्या मेरे जैसे और भी लोग हैं बस यही जानने के लिए ये लिख रहा हूँ की शायद कोई मेरे जैसा सोचने वाला भी इस दुनिया में है या सिर्फ एक मुझी को ही ये अजीबोगरीब सा स्वभाव दिया गया है।
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